
हर फ़ासीवादी शासन के फलने-फूलने के लिए ऐसे समुदायों और समूहों की ज़रूरत होती है जिनपर वो अत्याचार कर सके. इसकी शुरुआत एक या दो समूहों से होती है, लेकिन यह कभी ख़त्म नहीं होती
नफ़रत के आधार पर पनपा आंदोलन तभी तक चल सकता है जब तक भय और संघर्ष का माहौल बना हो. आज हम में से जो लोग यह सोच कर ख़ुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं कि वो मुसलमान या ईसाई नहीं हैं, वो मूर्खों की दुनिया में जी रहे हैं.”
“संघ पहले से ही वामपंथी इतिहासकारों और पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित युवाओं को निशाना बना रहा है. कल यह उन महिलाओं को निशाना बनाएगा जो स्कर्ट पहनती हैं, उन्हें निशाना बनाएगा जो मांस खाते हैं, जो शराब पीते हैं, दो विदेशी फ़िल्में देखते हैं, जो मंदिरों में नहीं जाते हैं, जो दंत मंजन की जगह टूथपेस्ट इस्तेमाल करते हैं, जो वैद्य के बजाये एलोपैथिक डॉक्टर से इलाज कराते हैं, जो जय श्री राम की जगह स्वागत में हाथ मिलाते हैं. कोई सुरक्षित नहीं है.”
अगर हम भारत को ज़िंदा रखने की उम्मीद करते हैं तो इन्हें समझना होगा.”
– सना गांगुली